Wanderer's Diary

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"परमात्मन परब्रम्हे मम शरीरं पाहि कुरु कुरु स्वाहा".....
कल्याण मस्तु..


गर आ जाये जीने का सलीका भी तो .........चंद रोज़ आफताब है इस ज़िन्दगी को गुलज़ार करने के लिए..

मंदिर बहुत दूर है चलो किसी रोते हुए हुए बच्चे को हंसाया जाए...

इन यादों के उजियारे को अपने साथ रखना ना जाने किस रोज़ किस डगर किस घडी इस ज़िन्दगी क़ि शाम होगी..

Stay Rolling .......Keep Rocking .....and Keep Smiling...........

Friday, April 15, 2011

गुलज़ार इ ग़ज़ल से चंद शब्द चुराए हैं तेरे लिए ......


आज दिल से आवाज़ आई...
तुमने गीत लिखे गुलज़ार लिखे...
दोस्ती भी की मौसिकी भी की...
शायर की तरह जस्बातों को एहसासों में पिरोया..
चंद ग़ज़ल भी लिखे मगर सूरज को ना लिखा...

तोह आज मैं सूरज को लिखता हूँ..

सूरज वो जो गीतों मे गुलज़ार है..
वो किरण जो कशिश है बहार है..
शीतल से मद्धम बारिश की फुहारें
स्वप्न के आकाश में उतरती कतारें..

सादगी और यारी में खुद को समेटे...
मै कह दूँ तो खुद को ना रोके...
वो एक शख्स मेरे किये जिसके खास मायने हैं..
सूरज वो जो ख़ुशी के साहिल में डूबा दे...

सूरज वो जो मुझसे कहने को बेकरार
सूरज वो जो सुनाने को तैयार..
एक नम हवा का झोंका
शरद में शामिल बसंत सी बहार..

संग जिसके मैंने यादों के पल समेटे...
संग जिसके बारिश में भींगे..
नदी में कुंए में डूबे मस्ती में भींगे..
मूवी को भागे हॉस्टल से कूदे..

बैठ साथ जिसके प्लान्स बनाये..
हवा हवाई में खूब ख्वाब संजोये..
साथ मिलके जिसके नैन लड़ाए..
साथ मिलके जिसके हँसे और रोये..

सारी दुनिया एक ओर वो और मै..
कोई हो ना हो वो और मै..
एक शख्स जो मुझे समझता है...
साथ मेरे चलता है...

दिल तो कहता है...और लिखूं
पर शब्द नहीं हैं बताने को..
की कितना खास है तू मेरे लिए...
शायद मै हूँ तेरे लिए और तू मेरे लिए...

गर साथ तुम मेरे ना होते..
तो मेरे एहसासों को अर्पण ना होते..
शायद इतनी रंगीन ना होती जिंदगानी..
और वक़्त की रवानी ना होती...

वक़्त के पन्नो पर ज़िन्दगी को करवट लेते देखा है..



इब्तेदा हसरतों को मजबूरियों में ढलते देखा है..
इरादों के शहर को गर्क होते देखा है...
कोई क्या समझेगा ख़ामोशी की जुबान ...
हमने सरे बाज़ार आवाज़ को दबते देखा है...

यकीन था खुले आसमान में उड़ने का...
मगर मजबूरियों को पंख कुतरते देखा है..
हकीकत में लोग क्या आईना दिखाते..
कुछ खास निगाहों को नज़र चुराते देखा है...

कभी मुरीद हुआ करता था दिल जिन वादियों का..
आज उन वादियों को बियांबर होते देखा है..
नुमाइश ही तो करते हैं आज लोग..
हर डगर हर गली तमाशा देखा है...
चंद लम्हों से क्या फासला बढेगा..
सालों को दिनों में बिखरते देखा है..
तुम ना मानो शायद मेरी बात को मगर
लोगों को अपनों से दामन छुडाते देखा है..

जिन मकानों को धूप से सँवारा करते  थे..
आज उन्हें अंधियारों में घिरा देखा है..
कुछ अजब से थे इस डगर के मुसाफिर
आज उन्हें दर से बेदखल होते देखा है..

मै शायद कह भी देता अपनी जुबान से..
की मै भी इस बस्ती का बाशिंदा हूँ..
क्या हो गया जो आवारगी में बसर करता हूँ..
कल के लिए ख़ामोशी को इख्तेयार करके देखा है...

वक़्त के पन्नो पर ज़िन्दगी को करवट लेते देखा है..